Thursday, September 30, 2010

कौन हुँ मैं....


इक रोशनी की किरण का मोहताज हुँ मैं...
जान बाकी है लेकिन एक एहसास हुँ मैं...
दिल दफ़्न हो चुका है साँसें जिन्दा हैं...
खुद से ही निराश हो चुकी एक आस हुँ मैं....!

जमाना डरता है जिससे वो दूरी हुँ मैं...
जो पूरी ना हो पायी कभी वो कहानी अधूरी हुँ मैं...
दिल मैं कुछ अरमान थे जो अब टूट गये हैं...
युँ ही बसर हो रही एक मजबूरी हुँ मैं......!

राहत ना दे पाये जो ऐसी छाया हुँ मैं...
खुद की ही गर्मी से जल्ती हुई काया हुँ मैं...
ये ख्याल जब से दिमाग में आये हैं...
सोचता रेहता हुँ बस यही, इन्सान हुँ या माया हुँ मैं....!

4 comments:

  1. खुद से ही निराश हो चुकी एक आस हुँ मैं
    सुंदर रचना बधाई

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  2. बहुत रोचक और सुन्दर अंदाज में लिखी गई रचना .....आभार

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