
खुदा हमे ऐसी खुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे...
खातावार समझेगी दुनिया तुझे
अब इतनी ज्यादा सफ़ाई न दे...
हंसू आज इतना की इस शोर में
सददा सिस्किओं की, सुनाई न दे...
गुलामी को बरकत समझने लगें
फकीरों को ऐसी रिहाई न दे...
अभी तो बदन में लहू है बहुत
नही चाहिए ऐसी जन्नत मुझे
जहाँ से मदीना दिखायी न दे...
मुझे तू अपनी चादर में यूं ढांप लो,
के ज़मीन-आसमान अब कुछ दिखाई न दे....!!
वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा
ReplyDeleteमुझे तू अपनी चादर में यूं ढांप लो,
ReplyDeleteके ज़मीन-आसमान अब कुछ दिखाई न दे....!!
गजब कि पंक्तियाँ हैं ...
बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...