Saturday, October 2, 2010


खुदा हमे ऐसी खुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे...

खातावार समझेगी दुनिया तुझे
अब इतनी ज्यादा सफ़ाई न दे...

हंसू आज इतना की इस शोर में
सददा सिस्किओं की, सुनाई न दे...

गुलामी को बरकत समझने लगें
फकीरों को ऐसी रिहाई न दे...

अभी तो बदन में लहू है बहुत
नही चाहिए ऐसी जन्नत मुझे
जहाँ से मदीना दिखायी न दे...

मुझे तू अपनी चादर में यूं ढांप लो,
के ज़मीन-आसमान अब कुछ दिखाई न दे....!!

2 comments:

  1. वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा

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  2. मुझे तू अपनी चादर में यूं ढांप लो,
    के ज़मीन-आसमान अब कुछ दिखाई न दे....!!

    गजब कि पंक्तियाँ हैं ...

    बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...

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