Wednesday, October 28, 2009

यादों का एक झोंका आया


यादों का एक झोंका आया हमसे मिलने बरसों बाद
पहले इतना रोये नही थे जितना रोये बरसो बाद........!

लम्हा लम्हा घर उजरा है मुशकिल से ये एहसास हुआ
पत्थर आए वर्षों पहले शीसा टूटे बरसों बाद.......!

भूल भी जाओ कैसे टूटा क्यूँ टूटा
ढूँढ
रहे हो क्या गालयों मे दिल के टुकरे बरसों बाद......!

दस्तक की उम्मीद लगाये कबतक ऐसे जीते रहें
कल मिलने का वादा करने वाले मिलने आए बरसो बाद......!

Saturday, October 24, 2009

पल पल तेरी याद आती है


उन्होंने अपनापन कभी दिखाया ही नही अपने गमे पल का साथी बनाया ही नही
गलतियाँ अपनी हम मान भी जाते पर क्या करें कसूर हमारा हमें बताया ही नही........!

हजारो झोपरियाँ जल कर रख होती है तब जा कर कंही एक महल बनता है
आशिकों के मरने पे कफ़न भी नही मिलता हसीनो के मरने पे ताजमहल बनता है.......!

जिंदगी मे कई ऐसे मौके आते हैं कुछ लम्हे हसते हैं कुछ रुलाते हैं
किसी बहने हम्मे याद करते रहना वरना आजकल लोग नाम तक भूल जाते हैं...........!

दिल मे है जो दर्द वो किसे बत्तायें हस्ते हुए ये जखम किसे दिखाएँ
कहती है ये दुन्या हमे खुसनसीब मगर इस नशीब की दास्ताँ हम किसे बत्तायें...........!

जिनकी तमन्ना दिल मे थी जुदाई अब हम उनकी सहते हैं
फुर्सत नही उन्हें हमसे कुछ बत्तें करने की इसलिए अब हम हर वक्त खामोश रहते हैं.......!

जिसको न थी मेरे प्यार की कदर उसी को चाह रहा था मै
उसी दिए ने जलाया मेरे हाथो को जिसको हवा से बचा रहा था मै...........!

इश्क करने वाला आँखों से आँखों की बात समझ लेते हैं
सपनो मै मिल जाए तो मुलाकात समझ लेते हैं
रोता तो ये आसमान भी है अपनी धरती के लिए पर लोग उसे बरसात समझ लेते हैं........!

समझा न कोई इस दिल की बात को दर्द दुनिया ने बिना सोचे ही दे दिया
सह गए जो हम चुपके से तो हमें ही पत्थर दिल कह दिया..........!

अब तो उन्हें फुर्सत नही हमारे लिए और हमारा हर वक्त गुजरता है उन्हें फरयाद करके
अगर आए जो वो हमारी मौत पे तो कह देना अभी सोये हैं हुम उन्हें याद करके..............!

Friday, October 23, 2009

याद


वफ़ा अगर रास न आए वो वफ़ा हम क्यूँ करें
दुआ अगर आसमान तक न जाए वो दुआ हम क्यूँ करें..........!

उस दीवानी का ख्वाब दिन रात देखते हैं हम
नसीब में फ़क़त ख्वाब हैं तो फ़िर मिलने की चाह क्यूँ करें.......!

दिल की हर एक धड़कन उस्सको आवाज देती है पल पल
वो सुनी को उनसुनी कर दे तो हम इज़हार ऐ वफ़ा क्यूँ करें.......!

उसकी याद तर्पएगी यूँही मुझे
बेहतर है भूल जाऊं "दोस्तों" ज़ख्म और गहरा क्यूँ करें..........!

Thursday, October 22, 2009

रास्तों की मर्जी है


बे जमीन लोंगो को
बे करार आँखों को
बे नसीब कदमो को
जिस तरफ़ भी ले जाए
रास्तों की मर्जी है................!

बे निशान जजीरो पर
बदगुमान रास्तों पर
जिस तरफ़ भी भटका दे
रास्तों की मर्जी है...............!

रोक दे या बढ़ने दे
थम ले या गिरने दे
वासल की लकीरों को
तोंर दे या मिलने दे
रास्तों की मर्जी है..............!

अजनबी कोई लाकर हमसफ़र बना दे
साथ चलने वालो की चाहे रख भी उरा दे
या यादें सारी खाक मे मिला दे
रास्तों की मर्जी है.............!

मेरे मालिक


"कदम उठने नही पाते की रास्ता काट देता है
मेरे मालिक मुझे आख़िर तू कब तक आजमाएगा!

अगूर टूटे किसी का दिल तो आस्क भर आँख रोती है
ये दुन्या है गुल्लो की जिसमे कांटे पिरोती है
हम अपने गाओं मे मिलतें हैं दुश्मन से भी इठला कर
तेरा शाहर देखा तो बहुत तकलीफ होती है!

हमें इस चिस्त से उम्मीद क्या थी और क्या निकला
कन्हा जाना हुआ था तय और कन्हा से रास्ता निकला
खुदा जिनको समझते थे वो सीशा थे पत्थर थे
जिसे पत्थर समझते थे वही अपना खुदा निकला!"